Sunday, 10 October 2010

घौर की खूद


8 अक्टूवर २०१० को काव्य एंव सान्स्क्रतिक सम्मेलन (KESS - 2020) दुबई मे प्रस्तुत की गयी व "ललीता छो छम्म" ग्ढवाली एलबम मे गीत के रुप मे यह कविता..

घौर की आज, याद छ आणी !
मांजी बाबा की, खुद सताणी !! - २
नी मणदू यू, पापी पराण !!!
गांव खोलो की, याद छ आण !!!!

देश पराया, मनखी विराण !
कै मा अपणी, खैरी लगाण !! - २
खुदेन्दू मन, दीन छां कटण !!!
दीन गिणी-गिणी, मन तै बुझाण !!!!
नी मणदू यु पापी पराण
दगडियो गैल्यो की, याद छ आण

सडकियो मा देखा, गाडियो की लैन !
छोटी-छोटी बातो मा, पोडदू छ फ़ैन !! - २
याद आणी छा, चाका की लैन !!!
रोड विचारी कन, बणी रैन्दी मौन !!!!
नी मणदू यू, पापी पराण
दीदी भुली की, याद छ आण

पडोसी अपणू, कू होलू कुजाणी !
एक हैकू दगडी, कभी नी बच्याणी !! - २
कभी हवेगे बिमार ता, कै मा बताण !!!
कन दीन कंटदा, और क्या लगाण !!!!
नी मणदु यू पापी पराण
भैजी भुला की, याद छ आण

छालू पाणी कू, हवेगे स्याणी !
यख देखा ता बस, यू लूण्या पाणी !! - २
याद आणी छ, हरी डान्डी कान्ठी !!!
मेरू पहाड की, रौतेली जमी !!!!
नी मणदू य़ू, पापी पराण
घौर की आज, याद छ आण

उन्ची ईमारत, उन्ची छ शान !
उन्चा छ लोग, उन्चा बच्यान्द !! - २
देश पराया, मनखी विराण !!!
हस्या खिल्या छ्वी, कैमा लगाण !!!!
नी मणदू यू पापी पराण
सुवा प्यारी की भी, याद छ आण

घौर की आज, याद छ आणी !
मांजी बाबा की, खुद सताणी !! - २
नी मणदू यू, पापी पराण !!!
गांव खोलो की, याद छ आण !!!!

विनोद जेठुडी,  अक्टूवर 2010
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