Monday, 4 June 2018

फौजी कु फर्ज अर परिवार

एक माँ कु फर्ज कु खातिर
हैकी माँ तै छोडीक चली ग्योँ मी
भारत माँ की रक्षा खातिर
आज शहिद हुवेग्योँ मी

माँ मै माफ करी
मै तेरु बुढेंदु कु सहारु नी बणी पायी
अपणु ख्याल रखी अर
औरोँ तै भी समझैयी

बाबा मेरु दुधी नौनियाल कु
खुब देखभाळ करी
अर वेतै भी बडु हुवेक
फौजी ही बणौयी

बीना... तू हिम्मत रखी अर
माँ बाबा की सेवा करी
मेरी खुद मा तू बीना
अकेला मा रोणी ना रैयी

हम फौजी छाँ 
देश क खातिर मरी मिटी जौला
पर भारत माँ पर कभी भी
आँच नी औणी द्योला
पर भारत माँ पर कभी भी
आँच नी औणी द्योला 

© Vinod Jethuri on 04/05/2018 @ Sharjah

पलायन

जख पढणु तै स्कूल न हो
गाँव जाणु तै सडक ना हो
विजळी की सुविधा ना हो
प्याणु तै पाणी न हो 
इलाज करणु तै अस्पताळ न हो
अर जू अस्पताळ हो भी
ऊ मा डाक्टरोँ कु नामो निशान न हो
तूम ही बुला वख रा त कन कैक रा
फिर पलायन नी करा ता क्या करा
© Vinod Jethuri on 06/05/2018 @ Sharjah

मी प्रवासी पहाडी छौँ

हर साल की तरह ये साल भी दुबई मा आयोजित उत्तराखँडी काब्य एँव साँस्क्रतिक सम्मेलन KESS - 2018 क अवसर पर मीन अपणी या कविता "मी प्रवासी पहाडी छौँ" प्रस्तुत करी, आप सभियोँ कु दग़डी सम्लियात करणु छौँ शायद आपतै भी पसँद आली । 

मी पहाडी छौँ, गढवाळी छौँ
देवभूमी उत्तराखँड कु रैबासी छौ                           
छोडी ये ग्योँ वीँ धरती तै ।
आज बण्यु परवासी छौँ ।।

परवासी बण शौक नी  मीतै
मजबूरी कु मारियुँ छौ
स्वास्थ्य, सडक अर शिक्षा जन
मूलभूत सुविधाओँ सी हारयुँ

विजळी हो जख दिखणु कु अर
बाठु हो हिटणु कु
स्कूल हो जख पढणु कु अर
मास्टर हो दिखणु कु  
तूम ही बुला कन कै राँ वख ?
जख स्कूल जांद छोरा बस नचणु कु

मी पहाडी छौँ, गढवाळी छौँ
डाँडीकाँठियोँ कु रैबासी छौ
याकुँ छोडी मीन वीँ धरती तै
आज बण्यु परवासी छौ

जख अस्पताळ हो ईलाज करणु कु
अर डाक्टर हो जान बचाण कु
तूम ही बुला तब कन कै राँ वख ?
बिन मौती कु अध-बाटु मुन्नु कु
एम्बुलेँस की सुविधा नी जख  
मरिजोँ तै अस्पताळ पहुँचाणु कु
वख दारु   वैन चना छन
घर घर दारु पहुँचाणु कु

मी पहाडी छौँ, गढवाळी छौँ
रौतेळ मुलक कु वासी छौ 
याकुँ छोडी मीन वा रौँतेली धरती
आज बण्यु परवासी छौ

राशन की दुकानियोँ मा जख
राशन नी खाणु कु (अरे मीन बोली)
ऊँ दुकानियोँ मा मीन सुणी अब
दारु मिलली प्याणु कु
रोजगार भले कुछ न हो वख
खाणु अर कमाणु कु
पर गौँ – खोळोँ का येथर पैथर
ठेका खुली गेन प्याणु कु

मी पहाडी छौँ, गढवाळी छौँ
घनघोर जँगळो कु रैबासी छौ
याकुँ छोडी मीन वीँ धरती तै
आज बण्यु परवासी छौ

खेती पाती कुछ कै नी सकदाँ
सुंगर अर बाँदर आणा छन खाणु कु
रात विरत कखी जै नी सकदाँ
मैसाग लग्युँ छ बोणो कु
धार सुखी गेन, गाड घटी गेन
पाणी नी मिलणु पेणू कु
तूम ही बुला कन कै राँ वख ?  
जख मूलभूत सुविधायेँ न हो जीणु कु

मी पहाडी छौँ, गढवाळी छौँ
गाड गदनियोँ कु रैबासी छौँ
याकुँ छोडी मीन ऊँ गदनियोँ तै
आज बण्यु परवासी छौ

सुविधायेँ भले कम हो लेकिन  
रौनक अलग ही छ पहाडोँ कु  
मनिखी ता रै पर देवता भी जख
पसंद.....,  करदन बसणु कु 
सडक, स्वास्थ्य अर शिक्षा दगडी
रोजगार हो गर वख जीणु कु
मनखियोँ तै स्वर्ग हुवे जालु
उत्तराखँड.....,  बसणु कु
मनखियोँ तै स्वर्ग हुवे जालु
उत्तराखँड..... बसणु कु - 2


© विनोद जेठुडी on 10/05/2018 @ KEES 2018

Tuesday, 11 July 2017

सरै गौंव सुनसान नजर औन्दु


यूं तिबारी - डिंडालियों मा 
अब क़िबलाट नी सुणेन्दु 
यूं चौक डिंडालियों मा 
भी क़्वी बैठण कु नी औन्दु 
छाजा - गुठ्यार मा 
क़्वी भैंसु नी रमंदु 
अर सरै गौंव खोळा मा 
क़्वी मनिख नी दिखेंदु 
कखी मेरी आँखि अर कन्दोड़ी 
फूटी ता नी गे होला 
किलै कि न कुछ दिखेंदु 
अर न कुछ सुणेन्दु 
सरै गौंव सुनसान नजर औन्दु 
सरै गौंव सुनसान नजर औन्दु 
© विनोद जेठुड़ी ११/०७/२०१७ 

Tuesday, 27 June 2017

दारु प्रेमी उत्तराखंड सरकार

धन्य हे उत्तराखंड सरकार

तेरी महिमा अपरम्पार
दारु प्रेमी दारुबिना नी रैंदी
अर सुचदी कि .......
दारु सी ही होलू उद्धार 

रास्ट्रीय सड़क छन जू हमारी
त्यों तै जिला सड़क बणियाली 
अर त्यों सडकियों  ऐथर-पैथर
दारु का त्वेन ठीका खोलियाली
धन्य हे उत्तराखंड सरकार
त्वेन बडू काम करियाली
पलायन तै रुकणु कु यू
बडू बेहतरीन तर्क खोजियाली
माँ बहिंणियों  विरोध करी जू
त्यों पर त्वेन लाठी चलैयाली 
ईन क्या जूर्म करी जू
पूलिस की पुरी फ़ोर्स लगैयाली
धन्य हे त्रिवेन्द्र सरकार
दारु सी इन क्या मोह ह्वे ग्यायी ?
रोंदी बिलखदी मां बहिणियों पर
जरा भी त्वे दया नी आयी ?

यीं दारू  जाणी !
कत्यों की मवासी घाम लगाई 
जूं चुलखेन्दो मा पकदी छी रुठ्ठी
त्यों चुल्लों की आग बुझाई
जूंक अपणा गैन दारू सी
त्युंकी त्वे पर लगली हाई
सुणी ले हे त्रिवेन्द्र सरकार
समळी जा अभी भी कुछ नी ह्वायी
बन्द करै दे त्यों ठिक्कों तै
जूं तै त्वेन जबरदस्ती.....
गौं सडकियों  धोर खुलाई 

मीन सूणी त्वेन हाल ही मा
textएक नयी योजना चलाई 
जू क्वी जै नी सकदू ठिक्को
त्योंतै त्वेन दारू की वैन चलाई
समली जा बगत  अभी भी
निथर भरी देर हवे जाली
जवीं दारू मा सुख दिखणी छैं
त्या दारू ही त्वेतै डुबाली
समळी जा हे उत्तराखंड सरकार
निथर भरी देर ह्वे जाली

ईन क्या  यीं दारू मा
जू दारू सी ईत्का लोभ ह्वे ग्यायी 
textदारू का ठिक्कों मा ही
कुबेर  भंडार दिख्यायी 
देख धी ऊंची डांडी कांठी
ह्यों-हिंवाळियों मा जडी  बूटी
पर्यटन का अपार सम्भावना छ्न
पर जरा सी वे पर काम करा धी
हौलीवुड बौलीवुड वाळों तै
फ़िल्म बणाण कु न्योतु दिवा धी
विदेशी पर्यटकों तै अपणी
स्वर्ग जन यीं धरती दिखा धी
वेदनी बुग्यालों मा कैम्प लगावा
ऋषिकेश तै योग सिटी बना धी
टिहरी  अनेरू पानी मा
नावों की रेस लगा धी
नैनीतालदेहरादून मसूरी
तै स्मार्ट सिटी बना धी
पलायन करी गें जू अपणा भै-बंद
ऊतै वापस घौर बुला धी
उत्तराखंड तै समर्ध बणाणु
कुछ ता जरा सी जातन करा धी
पर अफसोस कि
उत्तराखंड सरकार तै बस
दारु मा ही कुबेर का भण्डार दिखेंदू
दारू मा ही विकाश दिखेंदु छ 


© विनोद जेठुड़ी 

Monday, 27 June 2016

Garwali Poetry - Ekulwas (ईकुल्वास)

चखुलियों कु चैंच्याट मची गेधार मा त्यू घाम येगे
खडु उठ हे मंगथु बेटामुक धो अर आग जगै दे   |
मीन ............
मोळु गाडे देभैंसू पिजै देभैर कु काम सब निपटै दे
रतब्याणी बटी रबडा-रबडीखडु उठ अब एक घुट चाय पिलै दे ||

एक घत्ती पाणी ले दे धी अरनये धुये क भी तू येजै
कल्यो पकैक धर्युं छ मेरुखैक तू स्कुल चली जै  |
सुण ..............
गोर लिगी जैडांडा बटे देहाफ़ टैम मा दिखदी भी रै
ब्याखुनी दां जब छुट्टी होलीगोरो तै भी घर लेक औयी ||

तेरु भी बाबा बुरु हाल ह्वेगेकाम कु बोझ सरा त्वे पर येगे
भोल तीन लखडों कु जाणआज छुट्टी की अर्जी दे दे   |
अर हां स्कुल जाण सी पहली ..........................
भूल्ली तै दुध पिलै देभितर ग्वाडी देभैर बटी ताळु मारी दे
दिन मा औलु मी एक घडी कुचाभी भैर ब्यांर धारी दे ||

घास कु आज मै गदन ही जौलुरोपणी मा भी पाणी ळगौलु
बडी मुस्किल सी आयी बारीसरै पुंगडियो तै सौकी औलु |
हे जी हमार भी बखर खुलयानभोळ मै तुमार बखर लिजौलु
तूम भग्यानोन ही साथ दे मेरुतुमारु अहसान मै कन कै द्योलु ||

कचापिच ये बस्गाळ मा ह्वेगेखुट्टियों पर मेरु कादौं लगिगे
यीं द्योरी पर भी कांड लग्यां छ्नभितर च्वींक त्यू छ्लपंदु ह्वेगे |
येंसु रुडियो मा ये कुड तै छौळुमोरी-संगाडो तै भी ऊच्योळु
कुछ पैसा मंगथु कु बाबा अर, कुछ पैसा मै भी कमौलु ||

मुंडै बाण की चकडात पुडीं छकैमु झी मै हौळ लगौलु
जेठा जी होर तुम ही लगै द्यातुमारु सिवा अब कैमु जौलु |
धनकुर बुळ्या धनकुर द्योळुध्याडी बुळ्या ध्याडी दिलौलु
बळ्दो तै घास पाणीघर मु ही पहुँचै द्योलु ||

"ईखुली ईखुली मा चखुली की आस, ईखुली रैण कु ऊ अहसास
अपणु ही घर होंदु वनवास, कभी ना कै पर लगु ईकुल्वास" -


 ©  विनोद जेठुडी